२००८.... वर्ष कसं आलं आणि कसं गेलं काही कळलंच नाही. टिव्हीवर काही कार्यक्रम असला तर बघावा या सदहेतूने मी टी.व्ही. लावून त्याच्याकडे डोळे लावून बसले... आठ वाजले तरी नॉन-दुरदर्शन चॅनल्सवर काही रंगारंग कार्यक्रमच लागला नाही. साधारण १५ - २० वर्षापुर्वीचा काळ आठवला... आम्ही चौथी पाचवीत असू... ३१ डिसेंबर म्हणजे मस्त कार्यक्रम असायचे. संध्याकाळी ७ वाजल्या पासूनच टि. व्ही वर (दुरदर्शनवर)... गाणी, एकपात्री, गप्पा, जादूचे प्रयोग... आणि निखळ मनोरंजन... आई पपांसोबत बसून न लाजता बघण्यासारखे कार्यक्रम.... पूर्ण वर्षभरात आम्हाला ३१ डिसेंबरला रात्री उशीरापर्यंत जागायची मुभा असे. समाधी १०.३० पर्यंत लागायची ही गोष्ट वेगळी. पण मजा मात्र खुप यायची. जेवणं लवकर लवकर आटोपून आम्ही टि.व्ही. समोर येऊन बसायचो आणि मग आधी ताठ बसलेली आमची गाडी थोड्यावेळानी उशीला टेकायची, मग अजून थोड्यावेळानी पालथी पडून टि.व्ही.चा आनंद घ्यायची. मग डोळे बंद व्हायचे आणि आम्ही हळूहळू निद्राधीन व्हायचो.
काळानुसार सगळं बदलतं असं म्हणतात. टि.व्ही ही बदलला, कार्यक्रम बदलले, नवीन चॅनल्स आणि त्यांच्या धांगडधिंग्यात मनोरंजन कधी हरवलं कळलच नाही. रटाळ निवेदन, आई पपांसोबत बसून न पाहता येणारे कार्यक्रम आणि मग एकतर टि.व्ही. बंद व्हायचा किंवा कार्यक्रम कोणी बघायचं नाही. अचकट विचकट हावभाव, टुकार कार्यक्रम आणि दिवसभराच्या रामरगाड्यानं येणारी झोप... या सगळ्यात गेल्या ७ - ८ वर्षात मी नववर्षाचाअ कार्यक्रम रात्री जागून पाहिला नाही.
असो!
हे नवीन वर्ष सगळ्यांना सुख समाधानाचं जावो, सर्व आशा आकांक्षा पूर्ण करणारं जावो ही सदिच्छा!
सोनल :-)
31 December 2008
माझा नवीन ब्लॉग
निर्वाणषटकावरील विवेचनासाठी मला एक e mail आलेली की हिंदी मध्ये पोस्ट कराल का? हिंदी अनुवाद मी एका नवीन ब्लॉगवर पोस्ट करते आहे. हा त्याचा दुवा
हिंदी भाषेचे ज्ञान यथा तथाच असल्यानं जर काही चुका तुम्हाला अढळल्या तर त्या कृपया कॉमेंट्समध्ये नमूद कराव्यात. तीन पोस्ट्स दिल्या आहेत. चुकभूल माफ करा...
सोनल
हिंदी भाषेचे ज्ञान यथा तथाच असल्यानं जर काही चुका तुम्हाला अढळल्या तर त्या कृपया कॉमेंट्समध्ये नमूद कराव्यात. तीन पोस्ट्स दिल्या आहेत. चुकभूल माफ करा...
सोनल
निर्वाणषटक पर विवेचन - श्लोक ३
न मे द्वेष रागो न मे लोभ मोहौ । मदे नैव मे नैव मात्सर्यभाव ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष । चिदानंदरुप शिवोहं शिवोहं ॥ ३ ॥
द्वेष, राग, लोभ, मोह, मद, तथा मात्सर्य (मत्सर) यह सारे मनके भाव। लेकीन पहले दिये दो श्लोकोंसे यह ध्यान मे आता है के जहां अष्टधा प्रकृती अपनी नही, वहीं उस प्रकृतीमे बसा मन भी अपना नही। और इसलिये उस मन से संलग्न भाव भी अपने नही। मेरा मन ही मुझमे ना होने के कारण, तथा मेरा अहंकार पुर्णतः नाश होनेके कारण मन के सारे विकार नाश हो गये। वह भावनाये जाने के कारण उनकी वजहसे आनेवाले दोष भी नाश हो गये। जैसे किसी गहने से मिलावट निकालनेके बाद १६ आने सोना पिछे रह जाता है, वैसे ही "अहं भाव" नष्ट होनेसे सिर्फ़ आत्मारूप परमेश्वर का अंश रह जाता है। इसलिये आचार्य कहते है के, मन के सारे विकार नष्ट होनेसे मै निर्विकार हो गया हू। म्हणतात की मनाचे सर्व विकार जाऊन मी निर्विकार झालो आहे. सत चित आनंदरूप शिवरूप हो गया हू।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष । चिदानंदरुप शिवोहं शिवोहं ॥ ३ ॥
द्वेष, राग, लोभ, मोह, मद, तथा मात्सर्य (मत्सर) यह सारे मनके भाव। लेकीन पहले दिये दो श्लोकोंसे यह ध्यान मे आता है के जहां अष्टधा प्रकृती अपनी नही, वहीं उस प्रकृतीमे बसा मन भी अपना नही। और इसलिये उस मन से संलग्न भाव भी अपने नही। मेरा मन ही मुझमे ना होने के कारण, तथा मेरा अहंकार पुर्णतः नाश होनेके कारण मन के सारे विकार नाश हो गये। वह भावनाये जाने के कारण उनकी वजहसे आनेवाले दोष भी नाश हो गये। जैसे किसी गहने से मिलावट निकालनेके बाद १६ आने सोना पिछे रह जाता है, वैसे ही "अहं भाव" नष्ट होनेसे सिर्फ़ आत्मारूप परमेश्वर का अंश रह जाता है। इसलिये आचार्य कहते है के, मन के सारे विकार नष्ट होनेसे मै निर्विकार हो गया हू। म्हणतात की मनाचे सर्व विकार जाऊन मी निर्विकार झालो आहे. सत चित आनंदरूप शिवरूप हो गया हू।
27 December 2008
निर्वाणषटक पर विवेचन - श्लोक २
न च प्राण संज्ञो न वै पंचवायुः । न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोश ।
न वाक् पाणी पादौ न चोपस्य पायु । चिदानंदरुप शिवोहं शिवोहं ॥ २ ॥
वायू प्राण है। प्राण एक शक्ती है जो शरीरमे चेतना निर्माण करती है। यह प्राण सर्व सजीवामे होता है। सचेतन दुनिया के एकपेशीय सुक्ष्म जीवसे लेकर, अतिविशाल शार्क मछलीतक एकही प्राण, वही भगवानका अंश होता है। यह प्राण वायूपर अवलंबित रहता है।
एक श्वास सजीवोंमे चैतन्य है या नही यह दिखा देता है। और इसी लिये हम चैतन्यमय प्राण कहते है। इस तरहसे यह प्राण वायूपर निर्भर रहता है। परमात्मा का अंश मतलब आत्मा। आत्मासे निर्माण की हुई शक्ती मतलब प्राण। इसका मतलब यह के प्राण तो परमात्मा का अंश हुआ, परमात्मा का एक भाग हुआ। प्राण के पंचक व्यान, समान, अपान, उदान व प्राण यह है। यह सब तथा वायू मिलकर प्राण अर्थात आत्मा हुआ।
श्री शंकराचार्यजी कहते है के जो प्राण, पंचवायू मतलब आत्मा का एक भाग हुआ वह आत्मा ही परमेश्वरका अंश है। मेरा कुछभी नही है। यह देह, यह शरीर सप्तधातूसे बना है। वह सप्त धातू मतलब रस, रक्त, मेद, स्नायू, अस्थी, मज्जा, तथा शुक्र है। अन मतलब गती। आन मतलब ले जाने वाला, गती देनेवाला।
प्र + आन = प्राण मतलब हालचाल देनेवाला। यह मुख्यतः खून मे होता है।
अप + आन = अपान मतलब नीचे ले जानेवाला। शरीररस मे अपान होता है।
उद + आन = उदान मतलब उपर ले जानेवाला। यह काम स्नायू कर्ते है। इसलिये उदानका काम स्नायूमे होता है।
सम + आन = समान मतलब समतोल बनाये रखना। यह कार्य हड्डी का होता है।
वि + आन = व्यान मतलब विशेष हालचाल जो चरबी तथा मेद का कार्य होता है।
श्री. शंकराचार्यजी कहते है, यह प्राण, वायू, सप्त धातू, यह पंचकोश ये मेरे नही। क्योंकी यह सर्व देहसे संलग्न है। उनका व्यवहार देह के साथ चलता है। देहसे चैतन्य खतम हुआ तो इनका कार्य भी खतम होता है। आत्मासे इनका कुछ भी संबंध नही है। आत्मा जैसा है वैसाही रहता है।
इसही तरह वाक, पाणी, पादौ, चोपस्य, पायु यह सारे शरीरसे, विनाशी तत्वसे संलग्न है। यानी की शरीरके साथ ही उनका व्यवहार चलेगा। देह अथवा शरीर का नाश हुआ, शरीरसे चैतन्य गया, शरीर मृत हुआ तो इनका कार्य भी खत्म होता है। मतलब जो शरीरसे संलग्न है वो शरीरके साथ ही खत्म होते है। श्री. शंकराचार्यजी कहते है के ये सब शरीरके साथही जानेवाले है इसलिये मेरे है ही नही। तो, जो मेरा नही है उसके लिये मुझे कुछ भावना नही है। इसलिये मै मेरे भगवान स्वरूप आत्मा का हूं। मै सिर्फ शिवरूप और शिवरूपही हु। मेरे शरीरका व्यापार चलानेवाला तत्व मेरा नही। शरीरका अस्तित्व, पाच कोष ( अन्नमय, प्राणमय, मनोमय., विज्ञानमय, आनंदमय) मै नही। जिस कर्मेंद्रियके कर्तृत्वका सब को अभिमान होता है वह कर्मेंद्रिय भी अपनी नही। अब मै कुछ बोल भी नही सकता, क्योंकी मेरी वाणी भी मेरी नही है। इसलिये मै जो हू वो मंगलमय शिव ही हु!!
न वाक् पाणी पादौ न चोपस्य पायु । चिदानंदरुप शिवोहं शिवोहं ॥ २ ॥
वायू प्राण है। प्राण एक शक्ती है जो शरीरमे चेतना निर्माण करती है। यह प्राण सर्व सजीवामे होता है। सचेतन दुनिया के एकपेशीय सुक्ष्म जीवसे लेकर, अतिविशाल शार्क मछलीतक एकही प्राण, वही भगवानका अंश होता है। यह प्राण वायूपर अवलंबित रहता है।
एक श्वास सजीवोंमे चैतन्य है या नही यह दिखा देता है। और इसी लिये हम चैतन्यमय प्राण कहते है। इस तरहसे यह प्राण वायूपर निर्भर रहता है। परमात्मा का अंश मतलब आत्मा। आत्मासे निर्माण की हुई शक्ती मतलब प्राण। इसका मतलब यह के प्राण तो परमात्मा का अंश हुआ, परमात्मा का एक भाग हुआ। प्राण के पंचक व्यान, समान, अपान, उदान व प्राण यह है। यह सब तथा वायू मिलकर प्राण अर्थात आत्मा हुआ।
श्री शंकराचार्यजी कहते है के जो प्राण, पंचवायू मतलब आत्मा का एक भाग हुआ वह आत्मा ही परमेश्वरका अंश है। मेरा कुछभी नही है। यह देह, यह शरीर सप्तधातूसे बना है। वह सप्त धातू मतलब रस, रक्त, मेद, स्नायू, अस्थी, मज्जा, तथा शुक्र है। अन मतलब गती। आन मतलब ले जाने वाला, गती देनेवाला।
प्र + आन = प्राण मतलब हालचाल देनेवाला। यह मुख्यतः खून मे होता है।
अप + आन = अपान मतलब नीचे ले जानेवाला। शरीररस मे अपान होता है।
उद + आन = उदान मतलब उपर ले जानेवाला। यह काम स्नायू कर्ते है। इसलिये उदानका काम स्नायूमे होता है।
सम + आन = समान मतलब समतोल बनाये रखना। यह कार्य हड्डी का होता है।
वि + आन = व्यान मतलब विशेष हालचाल जो चरबी तथा मेद का कार्य होता है।
श्री. शंकराचार्यजी कहते है, यह प्राण, वायू, सप्त धातू, यह पंचकोश ये मेरे नही। क्योंकी यह सर्व देहसे संलग्न है। उनका व्यवहार देह के साथ चलता है। देहसे चैतन्य खतम हुआ तो इनका कार्य भी खतम होता है। आत्मासे इनका कुछ भी संबंध नही है। आत्मा जैसा है वैसाही रहता है।
इसही तरह वाक, पाणी, पादौ, चोपस्य, पायु यह सारे शरीरसे, विनाशी तत्वसे संलग्न है। यानी की शरीरके साथ ही उनका व्यवहार चलेगा। देह अथवा शरीर का नाश हुआ, शरीरसे चैतन्य गया, शरीर मृत हुआ तो इनका कार्य भी खत्म होता है। मतलब जो शरीरसे संलग्न है वो शरीरके साथ ही खत्म होते है। श्री. शंकराचार्यजी कहते है के ये सब शरीरके साथही जानेवाले है इसलिये मेरे है ही नही। तो, जो मेरा नही है उसके लिये मुझे कुछ भावना नही है। इसलिये मै मेरे भगवान स्वरूप आत्मा का हूं। मै सिर्फ शिवरूप और शिवरूपही हु। मेरे शरीरका व्यापार चलानेवाला तत्व मेरा नही। शरीरका अस्तित्व, पाच कोष ( अन्नमय, प्राणमय, मनोमय., विज्ञानमय, आनंदमय) मै नही। जिस कर्मेंद्रियके कर्तृत्वका सब को अभिमान होता है वह कर्मेंद्रिय भी अपनी नही। अब मै कुछ बोल भी नही सकता, क्योंकी मेरी वाणी भी मेरी नही है। इसलिये मै जो हू वो मंगलमय शिव ही हु!!
भारतीयांची पुन्हा भरारी....
ताज, CST, आणि ट्रायडंट... अतिरेक्यांच्या हल्ल्यातून फक्त एका महिन्यात सावरत पुन्हा दिमाखदारपणे देशी आणि विदेशी पर्यटकांच्या सेवेत रुजू झाले. हल्ल्याच्या कटू आठवणी मनाच्या कोपर्यात चिरकाल राहतील या बद्दल काही शंकाच नाही. परंतू या आठवणींनी रडत न बसता त्यावर मात करून आमच्या हिमतीला कोणी येरागबाळ्याने येउन ललकारू नये अशा आत्मविश्वासानं भारत पुन्हा उभारतोय.
लोकमतला आलेली ही अभिमानास्पद बातमी!
बातमीचा दुवा
ब्राव्हो!
लोकमतला आलेली ही अभिमानास्पद बातमी!
बातमीचा दुवा
ब्राव्हो!
23 November 2008
निर्वाणषटक पर विवेचन - श्लोक १
आद्य श्री. शंकराचार्यजी ने बहोत स्तोत्र तथा षटक संस्कृतमे लिखे है। इन मे वेदसारशिवस्तव, शिवनामावल्याष्टकम्, तथा निर्वाणषटकम् विशेष रुपसे सर्वश्रुत है। चिदानंद रुपम् शिवोहम् शिवोहम् यह उनका निर्वाणषटक जो आत्मषटक इस नाम से भी जाना जाता है।
निर्वाणषटक से संलग्न एक कथा कही जाती है। वो कुछ इस तरह है, एक बार शंकराचार्य अपने गुरूजी से मिलने गये। गुरू अपने कुटीमे बैठे थे। किसे के बाहर आनेकी आहट्से उन्होने अंदरसे ही कुतुहल से पुछा,"कौन है?"। अपने गुरू के इस सवाल का श्री. शंकराचार्यांजीने जो जवाब दिया वो आत्मषटक, निर्वाणषटक इस नाम से भी जाना जाता है।
सर्वसामान्य जन "कौन है?" इस सवाल पर "मै ही हू" यह जवाब दोहराता है। लेकिन श्री. शंकराचार्यजीने सामान्य जन से परे दिया हुआ जवाब उन्हे गुणातीत स्थितप्रज्ञ बना देता है। उनका यही जवाब आत्मषटक कहलाता है। यह निर्वाणषटक हमे बहुत कुछ सिखाता है। अपने गुरूके "कौन है?" इस सवाल का जवाब वह चार पंक्तियोंमे देते है। जवाब के पहली तीन पंक्तियोंमे वह मै कौन नही हू यह बताते है था चौथी पंक्तिमे वह असल मे कौन है यह बार बार दोहराते है। यही उनके इस आत्मषटक की, निर्वाणषटक की, विशेषता है। इस जवाब मे जो एक लय है उससे इन श्लोकोंका अपने मन पर विशेष प्रभाव पडता है। वह सारे आचार्योंसे अलग है, महान है तथा भव्य दिव्य है यह हम समझ सकते है।
मनोबुध्यहंकार चिताने नाहं । न च श्रोतजिव्हे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमी न तेजू न वायु । चिदानंदरुप शिवोहं शिवोहं ॥ १ ॥
इस श्लोक के पहले तीन पंक्तीमे वह क्या नही है वह कहते है। अपना शरीर अष्टधा प्रकृतीसे बना है, इसमे पंचमहाभूत जैसे पृथ्वी, आप, तेज, वायू तथा आकाश इनका समावेश होता है। सूक्ष्म तत्व मे मन, बुध्दी तथा अहंकार इनका समावेश होता है। इसका मतलब यह है के अपना देह पंचमहाभूत तथा मन, और बुध्दी तथा अहंकार इनसे बना है। इन पंचमहाभूतोंसे बना अपना शरीर जीवन के अंत मे इन ही पंचमहाभूतोंमे विलीन हो जाता है। मतलब यह के, जिसका लिया उसी को वापस किया। अपना कुछ है ही नही। पंचमहाभूतोंसे आया और वही वापस चला गया। जो अपना नही है उसे अपना कहना गलत है। वह तो एक प्रकार की चोरी ही हुई। इसलिये जिसका उको वापस देने पर अपने पास इस नश्वर शरीर के सिवाय कुछ रहता नही है। इसलिये इस नश्वर शरीर का खुद का ज्ञानेंद्रिय तथा कर्मेंद्रिय ऐसा कुछ भी नही है। जिस नाक, कान, आंख,जुबान तथा त्वचा के जरिये सुख या दुःख मिला है वह भी मेरा नही है। सुख और दुःख यह मन तथा बुद्धी का खेल है। अगर उनका अस्तित्व सुचित नही होता है तो अहंकार के जरिये मिलनेवाला अहंभाव भी सुचित नही होगा। और इसी वजहसे शंकराचार्यजी मे बसा गुणातीत तथा स्थितप्रज्ञ पुरूष अपना अस्तित्व दिखाता है। जो अपना नही है उसे शंकराचार्यजी अपना नही कहते। फिर बाकी रहता क्या है? इस चराचर सृष्टिमे दो ही चिजे है! एक देह दुसरा देही, एक शरीर दुसरा शरिरी, एक देह दुसरा आत्मा, एक क्षेत्रज्ञ तो दुसरा क्षेत्र, अपना नश्वर देह भी अपना नही है। मतलब यही है के जो अपने पास रहता है वो अविनाशी देही, आत्मा।
वह मात्र इश्वर का अंशरूप। और इसलिये शंकराचार्यजी यहा कहते है के, मै मन, बुद्धी, अहंकार, नाक, कान, जुबान, त्वचा, आंखे, पृथ्वी, आप, तेज, वायू, आकाश इन मे से कुछ भी नही। बाकी रहा प्राण, आत्मा वही मै हू। और यह आत्मा कैसा है? तो वह भगवंतरूप शिवरूप, सत चित आनंदरूप, शिवरूप है।
निर्वाणषटक से संलग्न एक कथा कही जाती है। वो कुछ इस तरह है, एक बार शंकराचार्य अपने गुरूजी से मिलने गये। गुरू अपने कुटीमे बैठे थे। किसे के बाहर आनेकी आहट्से उन्होने अंदरसे ही कुतुहल से पुछा,"कौन है?"। अपने गुरू के इस सवाल का श्री. शंकराचार्यांजीने जो जवाब दिया वो आत्मषटक, निर्वाणषटक इस नाम से भी जाना जाता है।
सर्वसामान्य जन "कौन है?" इस सवाल पर "मै ही हू" यह जवाब दोहराता है। लेकिन श्री. शंकराचार्यजीने सामान्य जन से परे दिया हुआ जवाब उन्हे गुणातीत स्थितप्रज्ञ बना देता है। उनका यही जवाब आत्मषटक कहलाता है। यह निर्वाणषटक हमे बहुत कुछ सिखाता है। अपने गुरूके "कौन है?" इस सवाल का जवाब वह चार पंक्तियोंमे देते है। जवाब के पहली तीन पंक्तियोंमे वह मै कौन नही हू यह बताते है था चौथी पंक्तिमे वह असल मे कौन है यह बार बार दोहराते है। यही उनके इस आत्मषटक की, निर्वाणषटक की, विशेषता है। इस जवाब मे जो एक लय है उससे इन श्लोकोंका अपने मन पर विशेष प्रभाव पडता है। वह सारे आचार्योंसे अलग है, महान है तथा भव्य दिव्य है यह हम समझ सकते है।
मनोबुध्यहंकार चिताने नाहं । न च श्रोतजिव्हे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमी न तेजू न वायु । चिदानंदरुप शिवोहं शिवोहं ॥ १ ॥
इस श्लोक के पहले तीन पंक्तीमे वह क्या नही है वह कहते है। अपना शरीर अष्टधा प्रकृतीसे बना है, इसमे पंचमहाभूत जैसे पृथ्वी, आप, तेज, वायू तथा आकाश इनका समावेश होता है। सूक्ष्म तत्व मे मन, बुध्दी तथा अहंकार इनका समावेश होता है। इसका मतलब यह है के अपना देह पंचमहाभूत तथा मन, और बुध्दी तथा अहंकार इनसे बना है। इन पंचमहाभूतोंसे बना अपना शरीर जीवन के अंत मे इन ही पंचमहाभूतोंमे विलीन हो जाता है। मतलब यह के, जिसका लिया उसी को वापस किया। अपना कुछ है ही नही। पंचमहाभूतोंसे आया और वही वापस चला गया। जो अपना नही है उसे अपना कहना गलत है। वह तो एक प्रकार की चोरी ही हुई। इसलिये जिसका उको वापस देने पर अपने पास इस नश्वर शरीर के सिवाय कुछ रहता नही है। इसलिये इस नश्वर शरीर का खुद का ज्ञानेंद्रिय तथा कर्मेंद्रिय ऐसा कुछ भी नही है। जिस नाक, कान, आंख,जुबान तथा त्वचा के जरिये सुख या दुःख मिला है वह भी मेरा नही है। सुख और दुःख यह मन तथा बुद्धी का खेल है। अगर उनका अस्तित्व सुचित नही होता है तो अहंकार के जरिये मिलनेवाला अहंभाव भी सुचित नही होगा। और इसी वजहसे शंकराचार्यजी मे बसा गुणातीत तथा स्थितप्रज्ञ पुरूष अपना अस्तित्व दिखाता है। जो अपना नही है उसे शंकराचार्यजी अपना नही कहते। फिर बाकी रहता क्या है? इस चराचर सृष्टिमे दो ही चिजे है! एक देह दुसरा देही, एक शरीर दुसरा शरिरी, एक देह दुसरा आत्मा, एक क्षेत्रज्ञ तो दुसरा क्षेत्र, अपना नश्वर देह भी अपना नही है। मतलब यही है के जो अपने पास रहता है वो अविनाशी देही, आत्मा।
वह मात्र इश्वर का अंशरूप। और इसलिये शंकराचार्यजी यहा कहते है के, मै मन, बुद्धी, अहंकार, नाक, कान, जुबान, त्वचा, आंखे, पृथ्वी, आप, तेज, वायू, आकाश इन मे से कुछ भी नही। बाकी रहा प्राण, आत्मा वही मै हू। और यह आत्मा कैसा है? तो वह भगवंतरूप शिवरूप, सत चित आनंदरूप, शिवरूप है।
07 November 2008
मला बदलायचयं
बरेच दिवस मी कोणाच्या ब्लॉगवर गेले नाही. आज संध्याकाळी जरा सवड काढली आणि गुगल वर सर्च मारला... अमिर खानच्या ब्लॉगच्या पत्त्यासाठी. त्याच्या नावाचा एक ब्लॉग सापडला. आता तिथे त्याचं नाव, एकदम सॉफिस्टिकेटेड भाषा आणि सगळं मुद्द्याला धरून लिहिलेलं होतं म्हणून मी ही माझ्या भोळ्या मनाची समजूत घातली की बये हा ब्लॉग आमिर खानचाच आहे हे मनात ठेवून वाच. उगाच चिकित्सा करत बसलीस की हा ब्लॉग आमिरचाच कशावरून? त्यानीच लिहिलं हे कशावरुन? बरं मिळालेल्या हजारो प्रतिक्रिया या वाचकांनीच दिलेल्या हे कशावरून? तर मग वाचन आणि मनन दुरच राहिल. त्या पेक्षा छान मन लाऊन वाच आणि चिकित्सा करू नकोस! मी त्या ब्लॉगवरची पोस्ट वाचली. आणि कॉमेंट द्यायचा विचार केला. मग वाटलं चित्रीकरणाच्या घाई गर्दीत याला ज्या हजारोंनी कॉमेंट्स येतात त्या हा कधी वाचतो? कधी त्याचा रिप्लाय देतो?
पोस्ट वाचून झाल्यावर एक मनात आलं... आपण ही आपलं वाचन, लिखाण थोडं बदलायचं. भाषेवर थोडी पकड आणायची. आणि स्वतःला थोडं बदलायचं. हा बदल कॉमेंट्स मिळवण्यासाठी नाही तर स्वतःला थोडं अजून सुधरवण्यासाठी... बाहेरच्या दुनियेत थोडंसं वेगळं उठून दिसण्यासाठी... मोजक्याच का होईना पण लोकांनी माझं लिखाण वाचावं आणि विचारावं "अरे... ते ब्लॉगवर लिहिणारी सोनल तूच का?"....
शुभस्य शीघ्रं!! Wish me best luck....
पोस्ट वाचून झाल्यावर एक मनात आलं... आपण ही आपलं वाचन, लिखाण थोडं बदलायचं. भाषेवर थोडी पकड आणायची. आणि स्वतःला थोडं बदलायचं. हा बदल कॉमेंट्स मिळवण्यासाठी नाही तर स्वतःला थोडं अजून सुधरवण्यासाठी... बाहेरच्या दुनियेत थोडंसं वेगळं उठून दिसण्यासाठी... मोजक्याच का होईना पण लोकांनी माझं लिखाण वाचावं आणि विचारावं "अरे... ते ब्लॉगवर लिहिणारी सोनल तूच का?"....
शुभस्य शीघ्रं!! Wish me best luck....
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